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पुख्ता साक्ष्य होने पर ही सीबीआई जांच

पुख्ता साक्ष्य होने पर ही सीबीआई जांच : कोर्ट

कार्ति चिदंबरम की अर्जी पर ईडी जवाब दे : हाईकोर्ट
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की धनशोधन के दो मामले से संबंधित याचिका पर ईडी से जवाब मांगा। साथ पीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 29 मई की तारीख तय की है। पीठ ने कहा है कि जांच एजेंसी याचिकाकर्ता कार्ति चिदंबरम की याचिका पर जवाब दे। पीठ ने 29 मई तक निचली अदालतों को भी इन मामलों में सुनवाई ना करने को कहा गया है। सांसद कार्ति ने तर्क दिया कि जब तक अनुसूचित अपराधों पर आरोप तय न हों बहस शुरू न हो।

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को विशेष परिस्थितियों में ही किसी मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए। पीठ ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

जस्टिस सुधांशु धुलिया और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को नियमित तरीके से या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी मामले की जांच सीबीआई को नहीं सौंपनी चाहिए। हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की जांच हरियाणा पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दी थी। हाल ही में पारित फैसले में पीठ ने कहा कि बिना किसी ठोस साक्ष्य के राज्य पुलिस पर लगाए गए अक्षमता के बेबुनियाद आरोप लगाने भर से मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का कोई समुचित कारण नजर नहीं आता है।

शीर्ष अदालत ने संविधान पीठ के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संवैधानिक अदालतों को किसी मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के लिए आदेश देने का पूरा अधिकार है। इसके साथ ही पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

निशुल्क कानूनी सहायता

‘निशुल्क कानूनी सहायता देने वालों का पंजीकरण हो’

नई दिल्ली, एजेंसी। संसदीय समिति ने निशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने वाले वकीलों के राष्ट्रीय पंजीयन की सिफारिश की है। साथ ही विधि स्वयंसेवकों को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

कानून एव कार्मिक अधिकारों की स्थायी समिति की हाल ही में संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि उचित प्रोत्साहन न मिलने के कारण निशुल्क कानूनी सेवा प्रदान करने वाले वकीलों की व्यापक भागीदारी नहीं हो पा रही है।

समिति ने विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत कानूनी सहायता के कामकाज की समीक्षा पर अपनी पिछली रिपोर्ट पर आगे उठाए गए कदमों से संबिधित रिपोर्ट में कहा कि ‘प्रो-बोनो’ को प्रोत्साहित किया जाए।

शादी का वादा और दुष्कर्म

शादी का वादा कर संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं

● जस्टिस बी.वी.नागरत्ना व सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने िदल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द करने हुए टिप्पणी की

● हाईकोर्ट ने सत्र अदालत द्वारा आरोपी को आरोपमुक्त करने का फैसला रद्द किया था


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा, शादी का वादा कर यौन संबंध बनाने का हर मामला दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जाएगा।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना व सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दुष्कर्म मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाल ही में पारित फैसले में कहा कि शीर्ष कोर्ट ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि महज शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने का हर मामला दुष्कर्म नहीं माना जाएगा।

पीठ ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 375 के तहत अपराध तभी बनता है, जब आरोपी द्वारा शादी का वादा सिर्फ यौन संबंध बनाने की सहमति प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया हो व उसका शुरू से ही वादा पूरा करने का कोई इरादा न हो। पीठ ने नईम अहमद बनाम दिल्ली सरकार के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा पारित पूर्व फैसले का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, जहां तक मौजूदा मामले का सवाल है तो इसमें नईम अहमद मामले में पारित फैसला पूरी तरह लागू होता है।

दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया : सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी व्यक्ति की ओर से दाखिल अपील स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 3 जनवरी, 2024 के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने सत्र अदालत द्वारा 8 जून 2023 को आरोपी को मामले में आरोपमुक्त करने का फैसला रद्द कर दिया था और उसके खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हम पाते हैं कि अदालत के लिए सीआरपीसी की धारा-227 के तहत शक्तियों का प्रयोग करने और अपीलकर्ता को आरोपमुक्त करने के लिए रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री थी।
यह था मामला
महिला की शिकायत पर एक व्यक्ति के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने 2021 में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किया था। महिला ने आरोप लगाया था कि व्यक्ति ने उससे शादी करने और उसके दो बच्चों की देखरेख करने का वादा करते हुए उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाया। बाद में व्यक्ति ने शादी से इनकार कर दिया। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला और आरोपी व्यक्ति एक दूसरे को 2011 से जानते थे और दोनों के बीच 2016 में प्रेम हुआ।

‘आरोप तय करने के चरण में ‘मिनी ट्रायल’ की इजाजत नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह सामान्य कानून है कि किसी आपराधिक मामले में आरोप तय करने के चरण में मुकदमे के लिए ‘मिनी ट्रायल’ की इजाजत नहीं है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर लाए गए साक्ष्यों व दस्तावेजों के साथ आगे बढ़ते यह निर्धारित करना है कि सामग्री से उभरने वाले तथ्य कथित अपराध के आवश्यक तत्वों के अस्तित्व को प्रकट करते हैं या नहीं।

उच्च न्यायालय को केवल रिकॉर्ड पर सामग्री के आधार पर ही फैसला करना चाहिए: पीठ
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में हम यह भी पाते हैं कि हाईकोर्ट ने दर्ज एफआईआर और चार्जशीट में आरोपों का विस्तृत विश्लेषण किया है, जबकि यह विचार करने में विफल रहा है कि आरोप तय करने के चरण में, अदालत को केवल रिकॉर्ड पर सामग्री के आधार पर ही फैसला करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि हस्तक्षेप और पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र के प्रयोग का दायरा अत्यंत सीमित है और इसका प्रयोग बहुत संयम से किया जाना चाहिए।

एनएएसी की वर्तमान कार्यप्रणाली पर चिंता जताई
याचिका में कहा गया कि एनएएसी द्वारा अपनाई गई वर्तमान कार्यप्रणाली के तहत निष्पक्षता-पारदर्शिता को लेकर चिंताएं हैं। याचिका में भ्रष्टाचार के एक मामले में एनएएसी अफसरों के खिलाफ एक फरवरी को सीबीआई द्वारा दर्ज केस का हवाला दिया गया। याचिका में कहा गया, यह मान्यता प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर परेशान करने वाले सवाल उठाता है।